एक वन नाइट स्टैंड ऐसा भी।


*एक वन‌ नाइट स्टैंड ऐसा भी*
पहली बार मुलाकात तब हुई इन जनाब से जब मिडिल क्लास परिवार का लड़का 3AC कि टिकट से प्रथम बार सफ़र कर रहा था, अपनी सीट खोजते खोजते सीट तक पहुंचा तो साहब हमसे पहले ही सीट पर विराजमान थे, यूं नज़र से नज़र मिली तो अनगिनत ही ख्यालों ने दिमाग़ को घेर लिया कि न जाने कितने ही अजनबियों के साथ रातें बिताई होगी इसने और इस से पहले की कुछ अपने पक्ष में कहता यह,दूर एक कोने में सरकाकर इस सरकारी कंबल को उसकी औकात याद दिला दी मैंने भी और अपने दो इंच के घमंड  का चश्मा लगा रेल के सफ़र का आनंद लेने लगा, किंतु जो मिलन किस्मत में लिखा में लिखा हो उसे कौन ही टाल सकता है, जैसे जैसे रात गहराने लगी ठंड अपनी पकड़ जमाने लगी,मै इसके करीब और करीब आता गया, सिर्फ पैर पैर पर ओढ़ लेता हूं, क्या फर्क पड़ेगा,पैर से घुटने तक, घुटने से छाती तक और मध्य रात्रि तक सर तक इसकी गर्माहट के आगोश में स्वयं को खो दिया था मैंने,सुबह जब विदा लेने का वक्त आया तो चुपके से नजरें चुराए निकल आया और दबा लिया इस 'वन नाइट स्टैंड' की कहानी को अपने ज़हन के गहरे राजों के बीच जहां घर की इन रूईदार साफ रजाइयों को मेरी इस बेबफाई की भनक तक न लगे ।।
खैर उस दिन से आज तक, अक्सर मिलते रहते है हम जाड़ों की ठिठुरती रातों में,कभी रेल में,कभी वेटिंग रूम तो कभी अस्पताल, जहां पहलमपहल नजरें चुराते और अगले ही पल एक दुसरे की बांहों में सुबह हो रही होती है।
*मैं और सरकारी कंबल*😉♥️


 

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