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एक वन नाइट स्टैंड ऐसा भी।

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*एक वन‌ नाइट स्टैंड ऐसा भी* पहली बार मुलाकात तब हुई इन जनाब से जब मिडिल क्लास परिवार का लड़का 3AC कि टिकट से प्रथम बार सफ़र कर रहा था, अपनी सीट खोजते खोजते सीट तक पहुंचा तो साहब हमसे पहले ही सीट पर विराजमान थे, यूं नज़र से नज़र मिली तो अनगिनत ही ख्यालों ने दिमाग़ को घेर लिया कि न जाने कितने ही अजनबियों के साथ रातें बिताई होगी इसने और इस से पहले की कुछ अपने पक्ष में कहता यह,दूर एक कोने में सरकाकर इस सरकारी कंबल को उसकी औकात याद दिला दी मैंने भी और अपने दो इंच के घमंड  का चश्मा लगा रेल के सफ़र का आनंद लेने लगा, किंतु जो मिलन किस्मत में लिखा में लिखा हो उसे कौन ही टाल सकता है, जैसे जैसे रात गहराने लगी ठंड अपनी पकड़ जमाने लगी,मै इसके करीब और करीब आता गया, सिर्फ पैर पैर पर ओढ़ लेता हूं, क्या फर्क पड़ेगा,पैर से घुटने तक, घुटने से छाती तक और मध्य रात्रि तक सर तक इसकी गर्माहट के आगोश में स्वयं को खो दिया था मैंने,सुबह जब विदा लेने का वक्त आया तो चुपके से नजरें चुराए निकल आया और दबा लिया इस 'वन नाइट स्टैंड' की कहानी को अपने ज़हन के गहरे राजों के बीच जहां घर की इन रूईदार साफ रजाइयों को म...

Happy Nurses day .

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दोहरा व्यवहार हम सब के ज़हन में कूट कूट कर भरा हुआ है,हर रोज़ न जाने कितनी ही जगह हम एक तरफ अपना रवैया नरम रखते और दूसरी तरफ़ काफी गलत, कईयों बार देखा है अस्पताल में मैंने, मरीज़ और उनके तिमारदार राउंड पर आए डॉक्टरों के सामने तो यूं व्यवहार करते है मानो दुनिया जहान की सारी समझदारी इनके अंदर भरी हुई है और जहां बात आती है नर्सों या बाकी अस्पताल कर्मचारियों के प्रति उनके व्यवहार की,तो अकसर उन्हें यह कहते पाया गया है कि  "डॉक्टर थोड़ी है, नर्स ही तो है !" बात भी सही है, नर्स ही है होने को तो वह,चलो अच्छी बात है आप जानते है कि नर्स है वह,पर क्या यह पता है आपको की, उनकी जिम्मेदारी न होते हुए भी इन्हीं नर्सों ने न जाने कितनी ही बार आपके लिए कितना कुछ किया है, आपकी दवाई से लेकर खान पान का एक घर के सदस्य की तरह ख्याल रखा है, एक अस्पताल की धड़कन माना जाता है नर्सों को, जो मरीज़ की हर छोटी-बड़ी जरूरतों से लेकर अस्पताल का भी ख्याल रखती है। तो अगली बार कभी अस्पताल जाएं तो "नर्स ही तो है" कहने से पहले यह जरूर सोच लिजियेगा कि आपकी बिमारी में यही थी जिन्होंने दवाइयां तो समय पर दी ह...

कुछ कहना था ! (भाग -1)

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  जैसा हमेशा मैं कहता हूं कि एक रिश्ता खत्म होने पर, "हम" से टूटकर दो लोग बनते है, एक 'छोड़ने वाला' और दूसरा 'छूटने वाला', छोड़ने वाला थोड़े मजबूत इरादों का होता है तो वह काफी आसानी से रिश्ते को भुला कर अपनी निजी जिंदगी में व्यस्त हो जाता है और छूटने वाला अक्सर वहीं खड़ा रहता है .. और इस जीवन राह में हमें (छूटने वाले) वहीं अटके देख कई राहगीर गुजरते हुए लाखों सलाह देते हैं, कोई ठेके का पता थमा जाता है तो कोई तो भईया कील-हथोड़ी लिए ख़ुद ही बॉब द बिल्डर बन अपना काम धंधा छोड़ वहीं हमें जोड़ने जुट जाता है पूरी शिद्दत से, ((जबकि असलियत में वह खुद की अटेंशन की भूख मिटा रहा होता है,कहते है न कि हर व्यक्ति को चाहिए कि किसी न किसी को उसकी जरूरत हो, तो हमें जोड़ने में जुटे यह लोग और कुछ नहीं वही भूख मिटा रहे है,खैर छोड़िए हम क्यों मुद्दे से भटके,कभी और लिखेंगे इस मुद्दे पर भी..)) हां तो दो प्रकार के राहगीर तो यह हुए जो कि 90% लोगों को मिलते है, किंतु हम लड़कों को एक नई प्रजाति भी मिलती है जो कि 'ठुकरा कर मेरा प्यार,मेरा इंतकाम देखेगी' गाना सुना कर हमें जिम ले जात...

तू सुलझी पहेली,है तेरा मोल ही क्या !🍁

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   कभी ऐसा हुआ है कि आप एक व्यक्ति को काफी वक्त से 'ना' नाम की गोली दे रहे हों और वह व्यक्ति अपनी पूरी शिद्दत से आपकी ना को हां में बदलवाने की हर मुमकिन कोशिशें करता है, फिर जैसे ही आपकी ना,हां में बदल जाती है,सामने वाला इंसान बदलने लगता है, ना जाने क्यों अब आप उसे इतने आकृषित नहीं लग रहे होते और एक दिन वह इंसान अचानक आपका काटकर मौका-ए-वारदात से फुर्र से फरार हो जाता है,और आप सोच में डूबे रह जाते है कि यह हुआ क्या !? होता दरअसल यह है कि आप तभी तक आकृषित लगते है जब तक आपको जीता नहीं जा सकता,जिस दिन आपकी ना, हां में बदल गई आप आकृषित लगना बंद हो जाएंगे और सामने वाला व्यक्ति निकल पड़ता है एक नई पहेली सुलझाने, आखिर एक सुलझी पहेली में किसे ही आनंद आता है, रोमांच तो एक कठीन पहेली को बूझने में है। किंतु कुछ ग़लत इंसानों के कारण अपने आप को न बदलें,हर बार धोखे खाएंगे परंतु खुद को नहीं खोना, क्योंकि तुम यही हो,पल में किसी से मुहब्बत हो जाना,पल में किसी अंजान से जुड़ जाना ,किसी को ना कभी नहीं कह पाना और औरों की खुशियों के लिए झुक जाना, यह नहीं कहता कि इंतजार करो एक बेहतर इंसान आएगा, क्यों...

ख़ुदग़रज़ी !! ~एक मोहब्बत ऐसी भी ..

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 अक्सर एक रिश्ता टूटने के बाद दो तरह के लोग बचते है, एक जो छोड़कर जाते है और दूसरे जिन्हें छोड़ा जाता है.. अब यह कहना बिल्कुल भी गलत नहीं होगा कि छोड़कर जाने वाले लोग शायद एक नियमित वक्त से पहले रिश्ते को, यादों को भुला देते है और जिन्हें छोड़ा जाता है वो वहीं खड़े रह जाते हैं सालों साल जहां रिश्ता टूटता है, ऐसा नहीं कोशिशें नहीं करते हम उस दल-दल से बाहर आने की, लेकिन जितनी कोशिशें करते है जितने हाथ पैर मारते है उतने ही और धंसते चले जाते है, खुद को कोसते हैं वक्त,किस्मत को कोसते है जाने वाले को गलत ठहराते है पर फायदा जरा भी नहीं मिलता, यादें उतनी ही और परेशान करती है,ऐसे में कुछ जरा कमजोर लोग हार मान अपने स्वाभिमान का बड़ी ही बेरहमी से कत्ल कर गिड़गिड़ाने वापस पहुंच जाते है, और कुछ दोस्तों या परिवार का हाथ मिलने पकड़कर बाहर निकल आते है.. फिर शुरू होता है दौर मुफ्त की सलाहों का, "अरे वो इंसान ही गलत था,तू भरोसा रख तुझे उस से बेहतर मिलेगी/मिलेगा !" "भाई/बहन तेरी मोहब्बत तो सच्ची थी,बस गलत इंसान से की, इंतजार कर तुझे बो सही इंसान जरूर मिलेगा" .. हर कोई यही सिखाता है कि...

प्रेम तलब की बगावत।

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*प्रेम-तलब की बगावत* तिलक लगाए बेखौफ मन, तोड़ बैठा रुढिता की बेडियां.. निकाब से झांकती...काजल में परिबंधित नयनों के दीदार में.. फिर एक दिन भिड़ गए जब वो नैना.. सड़क किनारे की एक आशिक की मजार में., वक्त यूं थम गया.. कि मानो कर्फ्यू लग गया हो दिल के बाजार में, खबर फैली.. अफवाहें बहने लगी., कि घायल हो गया एक निहत्था.. हथियारबद्ध हुस्न के अत्याचार में, खूब भड़के दंगे.. खूब ही टकराई तलवारें., और अंत में हार..अब्बू के भय को भुला.. वो कजरारे नयन भी डूब बैठे प्यार में खैर ज्यादा दिन न चला दौर ये छुपके मुलाकातों वाला.. बहती अफवाहों ने रुख कर शहर की ओर.. प्रेम महल फूंक डाला.. सहा..सहा.. और सहा.. पर फिर आपा हार ही गया प्रेम-तलब के आगे., बगावत हुई.. पंछी पिंजरा तोड़ आजाद हुए, पर इस बगावत ने लोगों की की बातों में आ... मौत का फतवा जारी करा दिया मोहल्ले के हर परिवार में कुछ दूर तो उड़ान भरी उन प्रेम पंछियों ने.. और फिर अचानक एक दिन, लाशें टंगी मिली दोनों की बीच बाजार में.. कुछ दिन खौफ में रहा माहौल.. पर.. फिर टकरा गए दो नैना.. किसी नए आशिक की मजार में।।🤤

अब और स्वीकार नहीं मुझे मेरे धर्म का अपमान,अब आवाजें उठेंगी।

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एक फैशन बन गया है आजकल, महिला सशक्तिकरण की बातों के नाम पर धर्म को निशाना बनाने का,उस धर्म को निशाना बनाने का जहां महिलाओं को देवी का दर्जा दिया गया है,जिस धर्म की हर पौराणिक गाथाओं में स्त्री सम्मान को सबसे ज्यादा महत्व दिया गया है,जहां मनुष्य तो मनुष्य, पशु पक्षियों तक ने स्त्री सम्मान में अपने प्राण त्याग दिए.. जटायु,जिन्होंने जब तक शरीर में शक्ति रही मां सीता के लिए लड़ाई जारी रखी और जब रावण के आगे हार गए तो मौत तक से भी हठ ले ली, स्वीकार नहीं किया मौत को तब तक जब तक श्री राम को माता सीता का हाल न सुना दिया, तो हाथ जोड़कर विनती है आपको नास्तिक रहना है रहे, हमें आपकी नास्तिकता से कोई आपत्ती नही किंतु यदी हमारी आस्था हमारे धर्म का मज़ाक बनाया गया तो अब हम चुप नहीं बैठेंगे ..!! हम भी महिलाओं को बराबर दर्जा दिलाने की इस लड़ाई में आपके साथ है यदी आप इस लड़ाई में अपने मुद्दों से हटकर किसी भी धर्म को निशाना न बनाएं तो। जय श्री राम।🙏🚩